
लेखक विशेष संवाददाता | लखनऊ
“दिल्ली की सत्ता का रास्ता लखनऊ से होकर जाता है”, यह कथन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष आदरणीय श्री मल्लिकार्जुन खड़गे ने उत्तर प्रदेश में पार्टी के एक कार्यक्रम में दिया। इसी मंच से उन्होंने राहुल गांधी द्वारा उठाए गए जातीय जनगणना और सामाजिक न्याय के मुद्दे को उत्तर भारत के संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया।
लेकिन सवाल उठता है – क्या उत्तर प्रदेश कांग्रेस संगठन स्वयं उस सामाजिक न्याय की बुनियाद पर खड़ा है, जिसे राहुल गांधी लगातार राष्ट्रीय मंचों पर उठा रहे हैं?
संगठन का जातिगत विश्लेषण: ‘सिस्टम’ की हकीकत
एक सरसरी नजर में ही साफ हो जाता है कि यूपी कांग्रेस के शीर्ष संगठनात्मक ढांचे में सवर्ण जातियों, विशेषकर ब्राह्मण समाज, का दबदबा असमान रूप से अधिक है। मुख्यालय स्तर पर कार्यरत लगभग 62-65 पदाधिकारियों में 28 ब्राह्मण, 8 क्षत्रिय और 3 कायस्थ, यानी कुल मिलाकर 39 पद सवर्ण जातियों के पास हैं। बाकी पदों में दलित, पिछड़ा, अति पिछड़ा और अल्पसंख्यक समुदाय के लोग “सांकेतिक” रूप से दिखाई देते हैं।
यदि इसे राहुल गांधी के जातीय जनगणना के विज़न के फ्रेम में रखा जाए, तो यह संरचना विवादास्पद ही नहीं, बल्कि विचारणीय भी बन जाती है।
प्रमुख पदाधिकारी: एक जातीय झलक
- प्रदेश अध्यक्ष:अजय राय (भूमिहार ब्राह्मण)
- कोषाध्यक्ष, मीडिया चेयरमैन, अनुशासन समिति, कार्यालय प्रभारी – सभी प्रमुख पदों पर ब्राह्मण चेहरे
- महिला कांग्रेस की कमान भी ब्राह्मण समाज के हाथ
- युवा कांग्रेस, एनएसयूआई, विचार विभाग, आउटरीच, सहकारिता, किसान कांग्रेस, विधि विभाग – अधिकांश में उच्च जातियों का प्रतिनिधित्व
यहाँ तक कि पार्टी के छह जोनल संयोजकों में से एक जोन की 31 पदों में 23 पद ब्राह्मण जाति से संबंधित हैं। यही अनुपात संभवतः अन्य जोनों में भी दोहराया जाएगा।
महिला सशक्तिकरण और अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व: एक अधूरा सपना?
प्रिंयका गांधी वाड्रा द्वारा शुरू किए गए महिला सशक्तिकरण अभियान को लेकर ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। संगठन में महिला नेतृत्व की भूमिका सीमित और प्रतीकात्मक दिखाई देती है। वहीं अल्पसंख्यक, दलित और ओबीसी वर्गों का प्रतिनिधित्व बहुत कमज़ोर और ‘अनिवार्य भरने’ जैसा है।
राहुल गांधी की चुनौती: विचार बनाम व्यवहार
राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा, जातीय जनगणना की मांग, और सामाजिक न्याय पर केंद्रित राजनीतिक दर्शन, कांग्रेस को एक नए विमर्श की ओर ले जाना चाहता है। लेकिन यदि पार्टी के प्रदेश संगठन खुद इस विचार को व्यवहार में नहीं उतार पाते, तो यह दृष्टिकोण नैतिक वैधता खो सकता है।
साफ कहा जाए तो गांधी और अंबेडकर के सपनों की राजनीति, लखनऊ कांग्रेस मुख्यालय की दीवारों में कैद होकर रह गई है।
क्या उत्तर प्रदेश कांग्रेस आत्मचिंतन करेगी?
राहुल गांधी की ‘पसमांदा न्याय’, ‘जातीय हक़दारी’ और ‘वंचितों की भागीदारी’ जैसी बातों को सिर्फ फुले फिल्म देखकर नहीं, बल्कि आंतरिक संगठनात्मक बदलाव के ज़रिए ही सिद्ध किया जा सकता है।
कांग्रेस यदि वास्तव में सामाजिक न्याय की राजनीति को अपनाना चाहती है, तो सबसे पहले उसे अपने ही घर की जातीय दीवारों को गिराना होगा।
(यह रिपोर्ट वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक श्री आलोक सिंह रैकवार की फेसबुक पोस्ट पर आधारित है। वह कांग्रेस से जुड़े एक सक्रिय चिंतक हैं।))
📌 विशेष टिप्पणी:
इस रिपोर्ट का उद्देश्य केवल विश्लेषण प्रस्तुत करना है, किसी व्यक्ति विशेष या समुदाय को निशाना बनाना नहीं। लोकतंत्र में विचारों की विविधता ही सबसे बड़ा बल है।

































